रसोई में इस्तेमाल होने वाला साधारण किचन स्पंज, अदृश्य प्रदूषण का स्रोत बनकर सामने आया

 

उज्जैन। रसोई में इस्तेमाल होने वाला साधारण किचन स्पंज (माइक्रोप्लास्टिक ) अब एक अदृश्य प्रदूषण का स्रोत बनकर सामने आया है। बर्तन धोते समय स्पंज के घिसने से हर साल प्रति व्यक्ति कई ग्राम तक माइक्रोप्लास्टिक निकलता है, जो पानी के रास्ते नदियों, मिट्टी और भोजन श्रृंखला तक पहुंच रहा है। भोपाल के बड़ा तालाब और अन्य जल स्रोतों में माइक्रो और नैनो प्लास्टिक के कण बड़ी मात्रा में पाए गए हैं।
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ सॉइल साइंस के अध्ययन में मप्र के विभिन्न स्थानों पर मृदा में भी माइक्रोप्लास्टिक  खासी मौजूदगी मिली है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण सॉलिड और लिक्विड वेस्ट का नियमानुसार निस्तारण नहीं होना पाया गया है। प्लास्टिक के यह अति सूक्ष्म कण हमें आंखों से तो दिखाई नहीं देते हैं लेकिन यह जमीन और पानी को दूषित कर विभिन्न रास्तों से हमारे शरीर के अंदर पहुंच रहे हैं और सेहत को नुकसान पहुंचा सकते हैं। खास बात यह है कि मप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पास इनकी जांच के इंतजाम तक नहीं हैं। पर्यावरण विभाग का ध्यान  माइक्रोप्लास्टिक की समस्या पर नहीं है।

सिंगल यूज प्लास्टिक पर पिछले 4 साल से प्रतिबंध

प्रदेश में सिंगल यूज प्लास्टिक पर पिछले 4 साल से प्रतिबंध है। इसके बावजूद इसका उपयोग जारी है। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि प्रदेश के घरेलू कचरे के साथ नगरीय निकायों में बनी कचरा खतियों पर साल भर में 2 लाख मीट्रिक टन से अधिक प्लास्टिक वेस्ट पहुंच रहा है। यह प्लास्टिक वेस्ट मिट्टी में जमा होता है और कई सालों बाद अंतत: यह छोटे-छोटे पार्टिकल्स में टूट जाता है। इनमें से जो कण 5 मिमी से छोटे होते हैं। एनजीटी ने माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण कम करने मल्टीलेयर्ड प्लास्टिक बनाने का काम और उसका उपयोग बिल्कुल बंद करने के लिए कहा है। नदियों और तालाबों के पहले बने एसटीपी/डब्ल्यूडब्ल्यूटीपी प्रणालियों पर स्क्रीन और फिल्टर जैसे भौतिक अवरोध स्थापित करें। मछली पकडऩे के उपकरणों से नदियों में प्रवेश करने वाले सूक्ष्म प्लास्टिक की मात्रा को कम करने के लिए बायोडिग्रेडेबल साधनों को अपनाया जाए। नदियों और तालाबों की सफाई हो।

सॉलिड वेस्ट का मैनेजमेंट नियमानुसार नहीं

प्रदेश में सॉलिड वेस्ट का मैनेजमेंट नियमानुसार नहीं हो पा रहा है। प्रतिदिन निकलने वाले कचरे का निस्तारण करने की कई शहरों के पास क्षमता ही नहीं है। यही नहीं डंपिंग साइट्स पर 40 लाख मीट्रिक टन से अधिक लीगेसी वेस्ट के पहाड़ बने हुए हैं। इससे निकलने वाले लीचेट में बड़ी मात्रा में माइक्रोप्लास्टिक और हेवी मेटल्स तक होते हैं। इससे जमीन के साथ भूजल और जल स्रोत दूषित हो रहे हैं। यही नहीं प्रदेश में अभी तक कुल निकलने वाले सीवेज में से बमुश्किल 60 फीसदी को ही साफ करने के लिए एसटीपी की व्यवस्था हो पाई है। शेष अनुपचारित सीवेज सीधे जलस्रोतों में जा रहा है। खेतों में फसलों की मल्चिंग के लिए प्लास्टिक की पन्नियों का उपयोग जमीन में माइक्रोप्लास्टिक बढा रहा है। भोपाल, इंदौर सहित कई अन्य शहरों में दर्जनों अवैध प्लास्टिक रीसाइक्लिंग इकाइयां चल रही हैं। इनसे निकलने वाले कचरे से भी समस्या बढ़ रही है। माइक्रो और नैनो प्लास्टिक स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा बन चुके हैं। लेकिन इनके नियंत्रण के लिए उचित कदम अभी तक नहीं उठाए गए हैं। इस बढ़ते खतरे को देखते हुए अब एमपीपीसीबी की केन्द्रीय प्रयोगशाला द्वारा माइक्रोप्लास्टिक विश्लेषण विधि का विकास करने का प्रस्ताव भेजा गया है। इसकी मंजूरी मिलने के बाद इसके लिए विशेष उपकरण खरीदे जाएंगे। इसके बाद ही प्रदेश में इसकी जांच शुरू हो पाएगी।

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